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RKCL - RSCIT- EXAM
CHAPTER - 4

डोमेन - इन्टरनेट में प्रयुक्त एड्रेस के मूलभूत हिस्से को डोमेन कहा जाता हैं. इन्टरनेट से जुड़े प्रत्येक कंप्यूटर का एक डोमेन नेम होता हैं जिसे डोमेन नेम सिस्टम (DNS) कहा जाता हैं. डोमेन नेम को मुख्यतः ३ भागों में बाँटा गया हैं

  • जेनेरिक डोमेन
  • कन्ट्री डोमेन
  • इनवर्स डोमेन

उदाहरण के लिए http://www.google.com  इसमें डब्लू डब्लू  डब्लू यह बतलाता हैं की यह एक इन्टरनेट पेज हैं जिसका नाम google हैं और इसका डोमेन .com हैं.

कम्प्यूटर की पीढ़ी -  कम्प्यूटर यथार्थ मे एक आश्चर्यजनक मशीन है। कम्प्यूटर को विभिन्न पीढ़ी मे वर्गीकृत किया गया है। समय अवधि के अनुसार कम्प्यूटर का वर्गीकरण नीचे दिया गया है।
प्रथम पीढ़ी के कम्प्यूटर ( 1945 से 1956)
द्वितीय पीढ़ी के कम्प्यूटर (1956 से 1963)
तृतीय पीढ़ी के कम्प्यूटर (1964 से 1971)
चतुर्थ पीढ़ी के कम्प्यूटर(1971 से वर्तमान)
पंचम पीढ़ी के कम्प्यूटर (वर्तमान से वर्तमान के उपरांत) 

प्रथम पीढ़ी के कम्प्यूटर ( 1945 से 1956)
सन् 1946 मे पेनिसलवेनिया विश्वविधालय के दो ईंजिनियर जिनका नाम प्रोफेसर इक्रर्टऔर जॉन था। उन्होने प्रथम डिजिटल कम्प्यूटर का निर्माण किया। जिसमे उन्होने वैक्यूम ट्यूब का उपयोग किया था। उन्होने अपने नए खोज का नाम इनिक(ENIAC) रखा था। इस कम्प्यूटर मे लगभग 18,000 वैक्यूम ट्यूब , 70,000 रजिस्टर और लगभग पांच मिलियन जोड़ थे । यह कम्प्यूटर एक बहुत भारी मशीन के समान था । जिसे चलाने के लिए लगभग 160 किलो वाट विद्युत उर्जा की आवशयकता होती थी।

द्वितीय पीढी के कम्प्यूटर ( 1956 से 1963 )
सन् 1948 मे ट्रांजिस्टर की खोज ने कम्प्यूटर के विकास मे महत्वपूर्ण भूमिका अदा की । अब वैक्यूम ट्यूब का स्थान ट्रांजिस्टर ने ले लिया जिसका उपयोग रेडियो ,टेलिविजन , कम्प्यूटर आदि बनाने मे किया जाने लगा । जिसका परिणाम यह हुआ कि मशीनो का आकार छोटा हो गया । कम्प्यूटर के निर्माण मे ट्रांजिस्टर के उपयोग से कम्प्यूटर अधिक उर्जा दक्ष ,तीव्र एवं अधिक विश्वसनिय हो गया । इस पीढी के कम्प्यूटर महंगे थे । द्वितीय पीढी के कम्प्यूटर मे मशीन लेंग्वेज़ को एसेम्बली लेंग्वेज़ के द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया । एसेम्बली लेंग्वेज़ मे कठिन बायनरी कोड की जगह संक्षिप्त प्रोग्रामिंग कोड लिखे जाते थे ।

तृतिय पीढी के कम्प्यूटर (1964 से 1975)
यद्यपि वैक्यूम ट्यूब का स्थान ट्रांजिस्टर ने ले लिया था परंतु इसके उपयोग से बहुत अधिक मात्रा मे ऊर्जा उत्पन्न होती थी जो कि कम्प्यूटर के आंतरिक अंगो के लिए हानिकारक थी । सन् 1958 मे जैक किलबे ने IC(integrated cercuit ) का निर्माण किया । जिससे कि वैज्ञानिको ने कम्प्यूटर के अधिक से अधिक घटको को एक एकल चिप पर समाहित किया गया , जिसे सेमीकंडकटर कहा गया, पर समाहित कर दिया । जिसका परिणम यह हुआ कि कम्प्यूटर अधिक तेज एवं छोटा हो गया ।

चतुर्थ पीढी के कम्प्यूटर
सन् 1971 मे बहुत अधिक मात्रा मे सर्किट को एक एकल चिप पर समाहित किया गया । LSI (large scale integrated circuit ) VLSI(very large scale integratd circuit ) ULSI(ultra large scale integrated circuit ) मे बहुत अधिक मात्रा मे सर्किट को एक एकल चिप पर समाहित किया गया । सन् 1975 मे प्रथम माइक्रो कम्प्यूटर Altair 8000 प्रस्तुत किया गया ।
सन् 1981 मे IBM ने पर्सनल कम्प्यूटर प्रस्तुत किया जिसका उपयोग घर, कार्यालय एवं विघालय मे होता है । चतुर्थ पीढी के कम्प्यूटर मे लेपटॉप का निर्माण किया गया । जो कि आकार मे ब्रिफकेस के समान था । plamtop का निर्माण किया गया जिसे जेब मे रखा जा सकता था

पंचम पीढी के कम्प्यूटर (वर्तमान से वर्तमान के बाद)
पंचम पीढी के कम्प्यूटर को परिभाषित करना कुछ कठिन होगा । इस पीढी के कम्प्यूटर लेखक सी क्लार्क के द्वारा लिखे उपन्यास अ स्पेस ओडिसी मे वर्णित HAL 9000 के समान ही है । ये रियल लाइफ कम्प्यूटर होंगे जिसमे आर्टिफिशल इंटेलिजेंस होगा । आधुनिक टेक्नॉलाजी एवं विज्ञान का उपयोग करके इसका निर्माण किया जाएगा जिसमे एक एकल सी. पी. यू . की जगह समानान्तर प्रोसेसिंग होगी । तथा इसमे सेमीकंडकटर टेक्नॉलाजी का उपयोग किया जाएगा जिसमे बिना किसी प्रतिरोध के विद्युत का बहाव होगा जिससे सूचना के बहाव की गति बढेगी ।

आपरेटिंग सिस्टम की विशेषताए

1)मेमोरी प्रबंधन - प्रोग्राम एवं आकडो को क्रियान्वित करने से पहले मेमोरी मे डालना पडता है अधिकतर आपरेटिंग सिस्टम एक समय मे एक से अधिक प्रोग्राम को मेमोरी मे रहने की सुविधा प्रदान करता है आपरेटिंग सिस्टम यह निश्चित करता है कि प्रयोग हो रही मेमोरी अधिलेखित न हो प्रोग्राम स्माप्त होने पर प्रयोग होने वाली मेमोरी मुक्त हो जाती है ।

2) मल्टी प्रोग्रामिंग - एक ही समय पर दो से अधिक प्रक्रियाओ का एक दूसरे पर प्रचालन होना मल्टी प्रोग्रामिंग कहलाता है । विशेष तकनिक के आधार पर सी.पी.यू. के द्वारा निर्णय लिया जाता है कि इन प्रोग्राम मे से किस प्रोग्राम को चलाना हैएक ही समय मे सी.पी. यू. किसी प्रोग्राम को चलाता है

3) मल्टी प्रोसेसिंग - एक समय मे एक से अधिक कार्य के क्रियान्वयन के लिए सिस्टम पर एक से अधिक सी.पी.यू रहते है । इस तकनीक को मल्टी प्रोसेसिंग कहते है । एक से अधिक प्रोसेसर उपल्ब्ध होने के कारण इनपुट आउटपुट एवं प्रोसेसींगतीनो कार्यो के मध्य समन्वय रहता है ।

4) मल्टी टास्किंग - मेमोरी मे रखे एक से अधिक प्रक्रियाओ मे परस्पर नियंत्रण मल्टी टास्किंग कहलाता है किसी प्रोग्राम से नियत्रण हटाने से पहले उसकी पूर्व दशा सुरक्षित कर ली जाती है जब नियंत्रण इस प्रोग्राम पर आता है प्रोग्राम अपनी पूर्व अवस्था मे रहता है । मल्टी टास्किंग मे यूजर को ऐसा प्रतित होता है कि सभी कार्य एक साथ चल रहे है।

5) मल्टी थ्रेडिंग - यह मल्टी टास्किंग का विस्तारित रूप है एक प्रोग्राम एक से अधिक थ्रेड एक ही समय मे चलाता है । उदाहरण के लिए एक स्प्रेडशिट लम्बी गरणा उस समय कर लेता है जिस समय यूजर आंकडे डालता है

6)रियल टाइम - रियल टाइम आपरेटिंग सिस्टम की प्रक्रिया बहुत ही तीव्र गति से होती है रियल टाइम आपरेटिंग सिस्टम का उपयोग तब किया जाता है जब कम्पयुटर के द्वारा किसी कारेय विशेष का नियंत्रण किया जा रहा होता है । इस प्रकार के प्रयोग का परिणाम तुरंत प्राप्त होता है । और इस परिणाम को अपनी गरणा मे तुरंत प्रयोग मे लाया जाता है । आवशअयकता पडने पर नियंत्रित्र की जाने वाली प्रक्रिया को बदला जा सकता है । इस तकनीक के द्वारा कम्पयुटर का कार्य लगातार आंकडे ग्रहण करना उनकी गरणा करना मेमोरी मे उन्हे व्यवस्थित करना तथा गरणा के परिणाम के आधार पर निर्देश देना है

इन्टरनेट

इन्टरनेट शब्द को अगर दो भागो मे बाँट दिया जाये तो इंटरनेशनल + नेटवर्क दो शब्द बनते हैं, और दोनों शब्दों का मतलब निकाला जाये तो इसका अर्थ आता हैं अन्तर्राष्ट्रीय जाल अर्थात ऐसा जाल जिसमे सम्पूर्ण संसार शामिल हो.  इंटरनेट दुनिया भर में सार्वजनिक रूप से सुलभ कंप्यूटर के सुपर नेटवर्क है. इंटरनेट नेटवर्क  मे हजारों की  संख्या मे पूरी दुनिया के कंप्यूटर जुड़े हुए हैं|

इंटरनेट का सफर, १९७० के दशक में, विंट सर्फ (Vint Cerf) और बाब काहन् (Bob Kanh) ने शुरू किया गया। उन्होनें एक ऐसे तरीके का आविष्कार किया, जिसके द्वारा कंप्यूटर पर किसी सूचना को छोटे-छोटे पैकेट में तोड़ा जा सकता था और दूसरे कम्प्यूटर में इस प्रकार से भेजा जा सकता था कि वे पैकेट दूसरे कम्प्यूटर पर पहुंच कर पुनः उस सूचना कि प्रतिलिपी बना सकें – अथार्त कंप्यूटरों के बीच संवाद करने का तरीका निकाला। इस तरीके को ट्रांसमिशन कंट्रोल प्रोटोकॉल {Transmission Control Protocol (TCP)} कहा गया।

सूचना का इस तरह से आदान प्रदान करना तब भी दुहराया जा सकता है जब किसी भी नेटवर्क में दो से अधिक कंप्यूटर हों। क्योंकि किसी भी नेटवर्क में हर कम्प्यूटर का खास पता होता है। इस पते को इण्टरनेट प्रोटोकॉल पता {Internet Protocol (I.P.) address} कहा जाता है। इण्टरनेट प्रोटोकॉल (I.P.) पता वास्तव में कुछ नम्बर होते हैं जो एक दूसरे से एक बिंदु के द्वारा अलग-अलग किए गए हैं।

सूचना को जब छोटे-छोटे पैकेटों में तोड़ कर दूसरे कम्प्यूटर में भेजा जाता है तो यह पैकेट एक तरह से एक चिट्ठी होती है जिसमें भेजने वाले कम्प्यूटर का पता और पाने वाले कम्प्यूटर का पता लिखा होता है। जब वह पैकेट किसी भी नेटवर्क कम्प्यूटर के पास पहुंचता है तो कम्प्यूटर देखता है कि वह पैकेट उसके लिए भेजा गया है या नहीं। यदि वह पैकेट उसके लिए नहीं भेजा गया है तो वह उसे आगे उस दिशा में बढ़ा देता है जिस दिशा में वह कंप्यूटर है जिसके लिये वह पैकेट भेजा गया है। इस तरह से पैकेट को एक जगह से दूसरी जगह भेजने को इण्टरनेट प्रोटोकॉल {Internet Protocol (I.P.)} कहा जाता है।

अक्सर कार्यालयों के सारे कम्प्यूटर आपस में एक दूसरे से जुड़े रहते हैं और वे एक दूसरे से संवाद कर सकते हैं। इसको Local Area Network (LAN) लैन कहते हैं। लैन में जुड़ा कोई कंप्यूटर या कोई अकेला कंप्यूटर, दूसरे कंप्यूटरों के साथ टेलीफोन लाइन या सेटेलाइट से जुड़ा रहता है। अर्थात, दुनिया भर के कम्प्यूटर एक दूसरे से जुड़े हैं। इण्टरनेट, दुनिया भर के कम्प्यूटर का ऎसा नेटवर्क है जो एक दूसरे से संवाद कर सकता है।

(ASCII) American Standard Code For Information Interchange

आज हम कंप्यूटर पर आसनी जो कुछ भी लिखते हैं वो आस्की में ही लिखा होता है. प्रत्येक कंप्यूटर प्रयोगकर्ता अंकों, अक्षरों तथा संकेतों के लिए बाइनरी सिस्टम पर आधारित कोड का निर्माण करके कंप्यूटर को परिचालित कर सकता है! लेकिन उसके कोड केवल उसी के द्वारा प्रोग्रामों और आदेशों के लिए लागू होंगे! इससे कंप्यूटर के प्रयोगकर्ता परस्पर सूचनाओं का आदान प्रदान तब तक नहीं कर सकते जब तक कि वे एक -दूसरे द्वारा इस्तेमाल किये हुए कोड संकेतों से परिचित न हों! सूचनाओं के आदान प्रदान की सुविधा के लिए अमेरिका मे एक मानक कोड तैयार किया गया है जिसे अब पूर विश्व मे मान्यता प्राप्त है! इसे आस्की (ASCII) के नाम से जाना जाता है! इसमे प्रत्येक अंक, अक्षरों वा संकेत को 8 बीटो से दर्शाया गया है! इन 8स्थानों पर केवल 0 और 1 की संख्या ही लिखी गयी है!

विभिन्न अंक प्रणाली

द्वि-अंकीय प्रणाली  - यह कंप्यूटर की सबसे महत्वपूर्ण प्रणाली हैं जिसके द्वारा ही हम कंप्यूटर से बात करते है. इस प्रणाली के अन्तर्गत आंकड़ों को मुख्य रूप से केवल दो अंकों के संयोजन द्वारा दर्शाया जाता है । ये दो अंक उपरोक्त ‘0’ तथा ‘1’ होते हैं परन्तु इस प्रणाली को द्वि-अंकीय या द्वि-आधारी पद्धति का नाम इसलिये दिया गया है क्योंकि इसमें विभिन्न आंकड़ों के कूट संकेत उस दी गई संख्या को दो से लगातार विभाजन के पश्चात प्राप्त परिणामों एवं शेषफल के आधार पर किया जाता है एवं इस कूट संकेत से पुनः दशमलव अंक प्राप्त करने पर इस कूट संकेत के अंकों को उसके स्थानीय मूल्य के बराबर 2 की घात निकालकर गुणा करते हैं एवं इनका योग फल निकाल कर ज्ञात किया जाता है । इस प्रणाली में बने हुए एक शब्द में प्रत्येक अक्षर को एक बिट कहा जाता है ।
011001 यह एक 6 बिट की संख्या है ।
11010010 यह एक 8 बिट की संख्या है ।

ऑक्टल (8 के आधार वाली) प्रणाली  - इस प्रणाली में उपयोग किये जाने वाले विभिन्न अंकों का आधार 8 होता है इन्ही कारणों से इस प्रणाली को ओक्टल प्रणाली के नाम से जाना जाता है । दूसरे शब्दों में इस प्रणाली में केवल 8 चिन्ह या अंक ही उपयोग किये जाते हैं – 0,1,2,3,4,5,6,7 (इसमें दशमलव प्रणाली की भांति 8 एवं 9 के अंकों का प्रयोग नहीं किया जाता) यहाँ सबसे बड़ा अंक 7 होता है (जो कि आधार से एक कम है) एवं एक ऑक्टल संख्या में प्रत्येक स्थिति 8 के आधार पर एक घात को प्रदर्शित करती हैं । यह घात ऑक्टल संख्या की स्थिति के अनुसार होती है । चूँकि इस प्रणाली में कुल “0” से लेकर “7” तक की संख्याओं को अर्थात 8 अंकों को प्रदर्शित करना होता है ।कम्प्यूटर को प्रषित करते समय इस ऑक्टल प्रणाली के शब्दों को बाइनरी समतुल्य कूट संकेतों में परिवर्तित कर लिया जाता है । जिससे कि कम्प्यूटर को संगणना हेतु द्वि-अंकीय आंकड़े मिलते हैं एवं समंक निरूपण इस ऑक्टल प्रणाली में किया जाता है जिससे कि समंक निरुपण क्रिया सरल एवं छोटी हो जाती है ।

हैक्सा (16 के आधार वाली) दशमलव प्रणाली - चुकी सामान्य गिनती ० से ९ तक की ही होती है इस कारन उससे ऊपर की गणना के लिए हैक्सा दशमलव प्रणाली का उपयोग किया जाता है.  हैक्सा दशमलव प्रणाली 16 के आधार वाली प्रणाली होती है . 16 आधार हमें यह बताता है कि इस प्रणाली के अन्तर्गत हम 16 विभिन्न अंक या अक्षर इस प्रणाली के अंतर्गत उपयोग कर सकते हैं । इन 16 अक्षरों में 10 अक्षर तो दशमलव प्रणाली के अंक 0,1,2,3,4,5,6,7,8,9 होते हैं एवं शेष 6 अंक A,B,C,D,E,F के द्वारा दर्शाये जाते हैं । जो कि दशमलव मूल्यों 10,11,12,13,14,15 को प्रदर्शित करते हैं । चूँकि हैक्सा दशमलव प्रणाली के अंतर्गत कुल 16 अंक प्रदर्शित करने होते हैं, इस प्रणाली के विभिन्न अक्षरों को द्वि-अंकीय प्रणाली के समतुल्य बनाने हेतु कुल 4 बिटों का प्रयोग किया जाता है ।

सॉफ्टवेयर दो प्रकार के होते हैं ।
1)सिस्टम सॉफ्टवेयर - “सिस्टम सॉफ्टवेयर” यह एक ऐसा प्रोग्राम होता है , जिनका काम सिस्टम अर्थात कम्प्यूटर को चलाना तथा उसे काम करने लायक बनाए रखना है । सिस्टम सॉफ्टवेयर ही हार्डवेयर में जान डालता है । ऑपरेटिंग सिस्टम, कम्पाइलर आदि सिस्टम सॉफ्यवेयर के मुख्य भाग हैं ।

 2)एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर - ‘एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर’ ऐसे प्रोग्रामों को कहा जाता है, जो हमारे कंप्यूटर पर आधारित मुख्य  कामों को करने के लिए लिखे जाते हैं । आवश्यकतानुसार भिन्न-भिन्न उपयोगों के लिए भिन्न-भिन्न सॉफ्टवेयर होते हैं । वेतन की गणना, लेन-देन का हिसाब, वस्तुओं का स्टाक रखना, बिक्री का हिसाब लगाना आदि कामों के लिए लिखे गए प्रोग्राम ही एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर कहे जाते  हैं ।

कम्प्यूटर वायरस

VIRUS – Vital Information Resources Under Seized

यह नाम सयोग वश बीमारी वाले वायरस से मिलता है मगर ये उनसे पूर्णतः अलग होते है.वायरस प्रोग्रामों का प्रमुख उददेश्य केवल कम्प्यूटर मेमोरी में एकत्रित आंकड़ों व संपर्क में आने वाले सभी प्रोग्रामों को अपने संक्रमण से प्रभावित करना है ।वास्तव में कम्प्यूटर वायरस कुछ निर्देशों का एक कम्प्यूटर प्रोग्राम मात्र होता है जो अत्यन्त सूक्षम किन्तु शक्तिशाली होता है । यह कम्प्यूटर को अपने तरीके से निर्देशित कर सकता है । ये वायरस प्रोग्राम किसी भी सामान्य कम्प्यूटर प्रोग्राम के साथ जुड़ जाते हैं और उनके माध्यम से कम्प्यूटरों में प्रवेश पाकर अपने उददेश्य अर्थात डाटा और प्रोग्राम को नष्ट करने के उददेश्य को पूरा करते हैं । अपने संक्रमणकारी प्रभाव से ये सम्पर्क में आने वाले सभी प्रोग्रामों को प्रभावित कर नष्ट अथवा क्षत-विक्षत कर देते हैं । वायरस से प्रभावित कोई भी कम्प्यूटर प्रोग्राम अपनी सामान्य कार्य शैली में अनजानी तथा अनचाही रूकावटें, गलतियां तथा कई अन्य समस्याएं पैदा कर देता है ।प्रत्येक वायरस प्रोग्राम कुछ कम्प्यूटर निर्देशों का एक समूह होता है जिसमें उसके अस्तित्व को बनाएं रखने का तरीका, संक्रमण फैलाने का तरीका तथा हानि का प्रकार निर्दिष्ट होता है । सभी कम्प्यूटर वायरस प्रोग्राम मुख्यतः असेम्बली भाषा या किसी उच्च स्तरीय भाषा जैसे “पास्कल” या “सी” में लिखे होते हैं ।

वायरस के प्रकार
1. बूट सेक्टर वायरस
2. फाइल वायरस
3. अन्य वायरस

वायरस का उपचार : टीके - जिस प्रकार वायरस सूक्षम प्रोग्राम कोड से अनेक हानिकारक प्रभाव छोड़ता है ठीक उसी तरह ऐसे कई प्रोग्राम बनाये गये हैं जो इन वायरसों को नेस्तानाबूद कर देते हैं, इन्हें ही वायरस के टीके कहा जाता है । यह टीके विभिन्नन वायरसों के चरित्र और प्रभाव पर संपूर्ण अध्ययन करके बनाये गये हैं और काफी प्रभावी सिद्ध हुयें है ।

कंप्यूटर भाषा (Computer Languages)

अपनी बातों को दूसरे के साथ एकदम सटीक तरीके से समझाने का माध्यम ही भाषा कहलाता है. हम कंप्यूटर से भी बात करते हैं मतलब हम कंप्यूटर को निर्देशित करते हैं और इस निर्देसन के लिए हम जिस भाषा का प्रयोग करते है वो कंप्यूटर भाषा के तौर पर जाना जाता हैं. कंप्यूटर केवल विद्युत धारा के चालू या बंद, ० या १ मे अंकित भाषा ही समझ सकता है इन्हें बिट Binary Digit कहा जाता है. अतः कंप्यूटर से यदि कोई कार्य समपन्न करना है तो इसी भाषा मे समादेश तथा सूचनाएं देनी होती है. शुरुआती दौर में कागज के कार्डों में छिद्र करके कंप्यूटरों को निर्देश दिए जाते थे.

कंप्यूटर भाषाओं के निम्न प्रकार होते हैं-

१.       मशीनी भाषा (Machine Language, Low Level Language, LLL)

२.      संयोजन भाषा (Assembly Language, Middle Level Language, MLL)

३.      उच्च स्तरीय भाषा (High Level Language, HLL)

मशीनी भाषा – कंप्यूटरों के विकास के बाद उनसे संवाद स्थापना के लिए अनुदेश बाइनरी सिस्टम मे ही अंकित किये जाते थे. इससे मशीन से सीधे संपर्क होता हैं, इसलिए इसे मशीनी भाषा कहा जाता हैं. कंप्यूटर मूलतः केवल यही भाषा समझता है. आज भी कंप्यूटर से संपर्क करने लिए हम इसी भाषा का प्रयोग करते है मगर काम करने वालो को इसका आभास नहीं हो पाता है. उपयोगकर्ता तथा कंप्यूटर के बीच प्रयुक्त भाषाएँ तथा प्रोग्राम इस कार्य को संपन्न करते रहते है.  

उदाहरण – अगर हम Keyboard से ‘A’ टाइप करते हैं तो कंप्यूटर पहले उसके लिए पूर्व से निर्धारित ASCII संख्या =65 पहचानती है और फिर उससे मशीनी भाषा मे बदलती है.         A = 65 = 1000001 मे बदलती हैं तब हमें एक आकृति प्राप्त होती है जो A होती हैं. यह सारी प्रक्रिया एक सेकंड के १००००० हिस्से मे होती है इस कारण हमें पता नहीं चलता.

मशीनी भाषा की समस्याएं- ० और १ मे कंप्यूटर को बार बार समझाने की प्रक्रीया आसान नहीं होती. अगर हमें कोई जटिल गणनाओं की आवश्यकता हो तो लिखने मे समस्या आ जाएगी.

संयोजन भाषा – ० और १ मे कंप्यूटर को बार बार समझाने की प्रक्रीया आसान नहीं होती इससे भाड़ी तनाव की स्थिति उत्पन होती है. इस तनाव से मुक्ति के लिए विशेषज्ञओ ने सांकेतिक भाषाओं का अविष्कार किया. उन्होंने प्रत्येक प्रक्रीया के लिए एक सरल शब्द को चुन लिया. ये शब्द मशीनी भाषा के ही पर्याय मान लिये गए. इन शब्दों से निर्मित भाषाओं को संयोजन भाषा कहा जाता हैं. इन शब्दों को पुनः कंप्यूटर को मशीनी भाषा मे समझाने के लिये असेम्ब्लेर का उपयोग किया जाता है.

उदाहरण – अगर हमे शीर्षक प्रारम्भ करना है तो SOH कमांड का प्रयोग किया जाता. जब भी कंप्यूटर पर नया शीर्षक की आवश्यकता होती वहाँ इस कमांड के उपयोग से कंप्यूटर समझ जाता की उसे अब नया शीर्षक बनाने का काम करना हैं. मशीनी भाषा मे कंप्यूटर को यह बात बतलाने के लिये ०,१,०,१,१,० जैसा एक लंबा लाइन लिखना पड़ता था.

संयोजन भाषा की समस्याएं- एक बार लिखे गए प्रोग्राम को बदलने मे समस्या उत्पन्न होती थी. इस भाषा मे प्रोग्राम लिखने के लिये प्रोग्रामर को उस मशीन की हार्डवेयर की भी जानकारी रखनी पड़ती थी जिसमे वो प्रोग्राम चलता.

उच्च स्तरीय भाषा – कंप्यूटर का व्यावसायिक उपयोग बढ़ाने के साथ एक नया समस्या सामने आया. हरेक व्यावसायिक कंप्यूटर उपयोगकर्ता को अपने व्यवसाय के अनुसार प्रोग्राम की आवश्यकता होने लगी. परन्तु कंप्यूटर कार्य प्रणाली को जानने वालों की संख्या बहुत ही सिमित थी. अचानक बड़ी संख्या मे विशेषज्ञ प्रोग्रामरों को तेयार करना संभव नहीं था. अतः विशेषज्ञ प्रोग्रामरो ने एक और भी आसान भाषा का विकास किया जिसे उच्च स्तरीय भाषा कहा गया. इस भाषा के अंतर्गत की-वर्ड का निर्माण किया गया. जो साधारण इंग्लिश शब्दों से मिलता था. इस कारण इसे आसानी से याद भी रखा जा सकता था. इसके उपयोग के लिये कंप्यूटर कार्य प्रणाली की जानकारी आवश्यक नहीं रह गया. उच्च स्तरीय भाषा को मशीनी भाषा मे कंप्यूटर को समझाने के लिये इंटर-प्रेटर की आवश्यकता होती है. C, C++, C#, FORTAN, PASCAL, ORACLE आदि इसके उदाहरण है.